दो वर्षों में 18 हाथियों की मौत, इंसानी जानें भी गईं—सवाल यह नहीं कि दोषी कौन, सवाल यह है कि अगली मौत रोकने की तैयारी कितनी है?
रायगढ़ जिले में हाथी–मानव संघर्ष अब सामान्य वन्यजीव घटना नहीं रह गया है। जंगलों से निकलकर हाथियों के झुंड गांवों, खेतों और सड़कों तक पहुंच रहे हैं। घरघोड़ा–रायगढ़ मार्ग पर पूंजीपथरा से पहले इमलीडीही और समारूमा के जंगल क्षेत्र में शाम के समय हाथियों के बड़े दल का सड़क पार करना लगातार चिंता का विषय बन रहा है। कई बार 35 से 50 हाथियों का झुंड इस क्षेत्र में दिखाई देने की बात सामने आती है।
इस संकट की गंभीरता सरकारी आंकड़ों से भी समझी जा सकती है। छत्तीसगढ़ विधानसभा में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार वर्ष 2024 में रायगढ़ जिले के रायगढ़ वन मंडल में 4 और धरमजयगढ़ वन मंडल में 3, कुल 7 हाथियों की मौत हुई। वर्ष 2025 में रायगढ़ वन मंडल में 7 और धरमजयगढ़ में 4, कुल 11 हाथियों की मौत दर्ज की गई। यानी इन दो वर्षों में रायगढ़ जिले के इन दोनों वन मंडलों में कुल 18 हाथियों की मौत हुई।
इन आंकड़ों को केवल वन्यजीवों की मृत्यु के आंकड़े मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इनके पीछे जंगल के बदलते स्वरूप, हाथियों के आवागमन के रास्तों में बढ़ती मानवीय गतिविधियां और भोजन-पानी की उपलब्धता से जुड़े कई सवाल छिपे हैं।
दूसरी ओर इंसानी जान का नुकसान भी इस संघर्ष का सबसे दुखद पक्ष है। 2025 में रायगढ़ में हाथियों के हमलों में कई लोगों की मौत की घटनाएं सामने आईं। मई में धरमजयगढ़ क्षेत्र में दो महिलाओं पर हाथी के हमले की घटना हुई, जबकि जुलाई में लैलूंगा क्षेत्र में एक ही घटनाक्रम में तीन लोगों की मौत की रिपोर्ट सामने आई।
हालांकि मानव मौतों के आंकड़ों को प्रस्तुत करते समय सावधानी जरूरी है। केंद्र सरकार के उपलब्ध आंकड़ों में वर्ष 2024-25 में पूरे छत्तीसगढ़ में हाथी हमलों से 53 मानव मौतें दर्ज हैं, लेकिन यह आंकड़ा पूरे राज्य का है, केवल रायगढ़ का नहीं। इसलिए जिला-वार प्रमाणित सरकारी आंकड़ा उपलब्ध हुए बिना रायगढ़ के लिए कोई निश्चित संख्या बताना उचित नहीं होगा।
आखिर संघर्ष बढ़ क्यों रहा है?
हाथी अपने प्राकृतिक आवास और पारंपरिक रास्तों पर चलता है। जब जंगलों के बीच सड़क, खनन, उद्योग, बिजली लाइन और मानव बस्तियां बढ़ती हैं, तो हाथियों के आवागमन के रास्ते प्रभावित होते हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान भी मानव–हाथी संघर्ष में आवास विखंडन, सड़क एवं बिजली अवसंरचना और बढ़ती मानवीय बस्तियों को महत्वपूर्ण दबावों से जोड़ता है।
इसलिए हाथी को केवल “हमलावर” और ग्रामीण को केवल “अतिक्रमणकारी” मानकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। दोनों अपने अस्तित्व और सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अब सड़क सुरक्षा भी प्राथमिकता बने
हाथियों की नियमित आवाजाही वाले मार्गों पर चेतावनी बोर्ड लगाना पर्याप्त नहीं है। वहां रियल-टाइम हाथी सूचना प्रणाली, रात्रिकालीन निगरानी, गति नियंत्रण, वन विभाग की त्वरित प्रतिक्रिया टीम और वाहन चालकों को तत्काल अलर्ट देने की व्यवस्था जरूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोग हाथियों को देखने के लिए उनके बेहद करीब न जाएं, हॉर्न न बजाएं, पीछा न करें और फोटो-वीडियो बनाने के लिए जोखिम न लें।
18 हाथियों की मौत हमें क्या बता रही है?
दो वर्षों में 18 हाथियों की मौत का आंकड़ा निश्चित रूप से गंभीर चेतावनी है। यह सवाल उठाता है कि क्या हमारे पास हाथियों के सुरक्षित आवागमन के लिए पर्याप्त कॉरिडोर हैं? क्या संवेदनशील गांवों और सड़कों की पहचान के बाद वहां लगातार निगरानी हो रही है? क्या बिजली और सड़क जैसी अधोसंरचना वन्यजीव सुरक्षा को ध्यान में रखकर संचालित हो रही है?
रायगढ़ औद्योगिक विकास के लिए महत्वपूर्ण जिला है। विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो जंगल और वन्यजीवों के अस्तित्व को नजरअंदाज करे, वह अंततः इंसानों के लिए भी नई समस्याएं पैदा करेगा।
हाथी जंगल का हिस्सा है और ग्रामीण भी इस भूगोल का हिस्सा हैं। समाधान किसी एक को हटाने में नहीं, बल्कि दोनों के बीच सुरक्षित दूरी और सुरक्षित रास्ता बनाने में है।
अब समय आंकड़े गिनने से आगे बढ़कर हर अगली मौत को रोकने की ठोस कार्ययोजना बनाने का है।

