तमनार (रायगढ़)। छत्तीसगढ़ के औद्योगिक और कोयलांचल क्षेत्र तमनार में पिछले दिनों हुई हिंसक झड़प के बाद अब जो तस्वीरें और वीडियो सामने आ रहे हैं, उन्होंने न केवल प्रशासन बल्कि समाज के नैतिक मूल्यों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कोल ब्लॉक के विरोध में भड़का जन-आक्रोश जब हिंसक हुआ, तो उसकी सबसे दर्दनाक कीमत एक महिला पुलिसकर्मी को अपनी गरिमा के साथ चुकानी पड़ी। वायरल हो रहे एक अमानवीय वीडियो ने तमनार के इतिहास में एक ऐसा काला पन्ना जोड़ दिया है, जिसे विकास या अधिकारों की किसी भी दलील से साफ नहीं किया जा सकता।
लोकतंत्र में अपनी जमीन और हक की लड़ाई लड़ना जनता का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन तमनार की इस घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या यह संघर्ष अब दिशाहीन हो चुका है? विरोध की आड़ में एक वर्दीधारी महिला कर्मी के साथ किया गया दुर्व्यवहार न केवल कानून की नजर में अपराध है, बल्कि यह हमारी उस सनातनी परंपरा पर भी गहरा आघात है जहाँ नारी को देवी का रूप मानकर पूजा जाता है। इतिहास साक्षी है कि जिस समाज या सत्ता ने स्त्री की लज्जा के साथ खिलवाड़ करने का प्रयास किया, उसका अंत विनाशकारी रहा है। महाभारत के कुरुवंश का उदाहरण हमारे सामने है, जहाँ द्रौपदी के चीरहरण के बाद एक पूरे साम्राज्य का विध्वंस हो गया था। तमनार में हुआ यह कृत्य भी समाज के लिए एक चेतावनी की तरह है।
इस घटना ने प्रशासनिक खामियों की भी पोल खोल दी है। भीड़ के बीच अपनी ही एक महिला सहकर्मी को अमानवीय व्यवहार से न बचा पाना पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली और सुरक्षा प्रोटोकॉल पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है। जब रक्षक ही भीड़ के बीच असुरक्षित महसूस करने लगें, तो आम जनता के भीतर भय व्याप्त होना स्वाभाविक है। आंदोलन की कथित ‘सफलता’ का दावा करने वाले नेतृत्व को यह समझना होगा कि यदि संघर्ष की राह में मर्यादाएं टूटती हैं, तो वह आंदोलन जनहित का न रहकर केवल अराजकता का माध्यम बन जाता है।
स्थानीय निवासियों और जागरूक नागरिकों में इस घटना को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का मानना है कि वैचारिक लड़ाई को व्यक्तिगत गरिमा और अस्मिता तक ले जाना सर्वथा अनुचित है। तमनार की माटी, जो कभी संघर्षों की गवाह रही है, आज इस ‘काले दिन’ के कारण शर्मसार है। अंततः, यह समय केवल कानूनी कार्रवाई का नहीं बल्कि सामाजिक आत्मचिंतन का भी है कि हम विकास और विरोध की इस दौड़ में अपनी संवेदनाएं और संस्कार कहाँ पीछे छोड़ आए हैं? मर्यादा विहीन समाज कभी भी गौरवशाली भविष्य का निर्माण नहीं कर सकता।

